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क्या आपका बच्चा बार-बार एक आंख घुमाकर देखता है? या फिर धूप में एक आंख बंद कर लेता है? ये इशारे मामूली आदत नहीं, बल्कि भेंगापन यानी स्क्विंट के संकेत हो सकते हैं।
भेंगापन सिर्फ दिखने की समस्या नहीं है। समय पर ध्यान न दिया जाए तो यह बच्चे की दृष्टि को हमेशा के लिए कमजोर कर सकता है। अच्छी खबर यह है कि आज के समय में इसका इलाज पूरी तरह संभव है — कुछ मामलों में चश्मे और एक्सरसाइज से, तो कुछ में सर्जरी से।
इस ब्लॉग में हम आसान भाषा में समझेंगे कि भेंगापन क्यों होता है, इसका इलाज कैसे होता है, और सर्जरी की जरूरत कब और किसे पड़ती है।
स्क्विंट यानी स्ट्रैबिस्मस एक ऐसी स्थिति है जिसमें दोनों आंखें एक साथ, एक ही दिशा में नहीं देख पातीं। एक आंख सीधी रहती है, जबकि दूसरी अंदर, बाहर, ऊपर या नीचे की ओर मुड़ जाती है।
आंखों को सीध में रखने का काम छह छोटी मांसपेशियां करती हैं। जब इन मांसपेशियों के बीच तालमेल बिगड़ जाता है, तो आंखें अलग-अलग दिशाओं में देखने लगती हैं। यही भेंगापन कहलाता है।
यह समस्या बच्चों में ज्यादा आम है, लेकिन बड़ों को भी हो सकती है।
भेंगापन के पीछे कई कारण हो सकते हैं:
कुछ मामलों में भेंगापन जन्म से ही दिख जाता है, तो कुछ में यह बाद में उम्र बढ़ने के साथ सामने आता है।
शुरुआती स्टेज में भेंगापन पहचानना मुश्किल लग सकता है, लेकिन कुछ संकेतों पर ध्यान देकर आप इसे जल्दी पकड़ सकते हैं:
अगर आपके बच्चे में ये लक्षण दिखें, तो देर न करें। जितनी जल्दी जांच होगी, इलाज उतना ही आसान और असरदार रहेगा।
हर भेंगापन के मामले में सर्जरी जरूरी नहीं होती। डॉक्टर पहले कम इनवेसिव तरीके आजमाते हैं:
अगर भेंगापन का कारण आंखों का नंबर है, तो सही चश्मा पहनने से ही आंखें सीधी हो सकती हैं। यह सबसे पहला और आसान इलाज है।
अगर एक आंख कमजोर है (एंबलायोपिया यानी आलसी आंख), तो अच्छी आंख पर पैच लगाकर कमजोर आंख को मेहनत करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
कुछ खास तरह के भेंगापन में, जैसे कन्वर्जेंस इन्सफिशिएंसी, आंखों की एक्सरसाइज से काफी सुधार आता है।
कुछ मामलों में डॉक्टर आई ड्रॉप या बोटॉक्स इंजेक्शन की सलाह देते हैं, ताकि अकड़ी हुई मांसपेशी ढीली हो सके।
यहां वह सवाल आता है जो ज्यादातर मरीज और पेरेंट्स पूछते हैं — आखिर सर्जरी की नौबत कब आती है?
डॉक्टर सर्जरी की सलाह तब देते हैं जब:
सीधे शब्दों में कहें तो, जब गैर-सर्जिकल तरीके भेंगापन को ठीक करने में नाकाम रहते हैं, या समस्या बहुत गंभीर होती है, तभी सर्जरी का रास्ता अपनाया जाता है।
बच्चों में सर्जरी की सबसे सही उम्र को लेकर डॉक्टर मरीज की स्थिति देखकर फैसला लेते हैं। आमतौर पर 3 से 6 साल की उम्र को सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इस दौरान आंखें और दिमाग तेजी से विकसित हो रहे होते हैं। हालांकि अगर जरूरत पड़े तो 1 साल की उम्र के बाद भी सर्जरी की जा सकती है।
जितनी जल्दी इलाज शुरू होता है, दीर्घकालिक दृष्टि समस्याओं को रोकने की संभावना उतनी ही ज्यादा रहती है।
बड़ों में भेंगापन दो तरह से हो सकता है — बचपन से चली आ रही स्थायी समस्या, या हाल ही में किसी बीमारी, चोट या थायरॉइड जैसी वजह से अचानक शुरू हुई समस्या।
वयस्कों में सर्जरी का मकसद सिर्फ दिखावट सुधारना ही नहीं, बल्कि डबल विजन और आंखों की थकान जैसी तकलीफों को दूर करना भी होता है।
स्क्विंट सर्जरी को आई मसल सर्जरी भी कहा जाता है। इस प्रक्रिया में सर्जन आंख की मांसपेशियों को थोड़ा खींचकर, काटकर या खिसकाकर उनकी पोजीशन ठीक करते हैं, जिससे दोनों आंखें एक सीध में आ जाएं।
इस बारे में कुछ जरूरी बातें:
ऑपरेशन के बाद सही देखभाल से रिकवरी जल्दी और बेहतर होती है:
ज्यादातर मरीज 1 से 2 हफ्तों के अंदर अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट आते हैं।
भेंगापन जितना आम है, उतना ही इसका इलाज संवेदनशील भी है। गलत डायग्नोसिस या देरी से बच्चे की आंखों पर स्थायी असर पड़ सकता है। इसलिए अनुभवी स्क्विंट स्पेशलिस्ट और सही जांच सुविधाओं वाले अस्पताल का चुनाव बहुत मायने रखता है।
अगर आप लखनऊ में भेंगापन के इलाज के लिए किसी भरोसेमंद जगह की तलाश में हैं, तो Susanjeevani Hospital एक अच्छा विकल्प है। यहां अनुभवी नेत्र सर्जनों की टीम, आधुनिक जांच उपकरण और बच्चों से लेकर बड़ों तक, हर उम्र के मरीजों के लिए व्यक्तिगत इलाज योजना उपलब्ध है। eye hospital की तलाश करते समय अनुभव, तकनीक और मरीजों की संतुष्टि को जरूर परखें — यही पैमाने किसी भी best eye hospital की पहचान होते हैं।
अगर आपको या आपके बच्चे को भेंगापन के लक्षण दिख रहे हैं, तो इंतजार न करें। जल्द से जल्द आंखों की जांच करवाएं और सही इलाज की दिशा में पहला कदम उठाएं।